आरक्षण: एससी आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था जरूरी, सीजेआई बीआर गवई का सुझाव *FJHJ* #24
आंध्र प्रदेश के अमरावती में रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण लाभ में आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग को बाहर करने की व्यवस्था लागू होनी चाहिए। उन्होंने ओबीसी आरक्षण की तर्ज पर एससी में भी क्रीमी लेयर की पहचान पर जोर दिया, ताकि जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचे। यह बयान संविधान के मूल्यों पर आधारित है।
आरक्षण नीति पर स्पष्ट रुख
भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने रविवार को आंध्र प्रदेश के अमरावती में 'इंडिया एंड द लिविंग इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन ऐट 75 इयर्स' कार्यक्रम में आरक्षण व्यवस्था पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर को बाहर करने के पक्ष में अपनी राय दोहराई। उनका कहना था कि आर्थिक-सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके लोगों को आरक्षण का लाभ न देकर इसे वास्तविक जरूरतमंदों तक सीमित रखना चाहिए। यह विचार उन्होंने पहले इंद्रा साहनी मामले में भी व्यक्त किया था, जहां ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा को मान्यता मिली थी। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि संपन्न वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सदस्यों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
संविधान की जीवंतता और मूल सिद्धांत
कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश ने भारतीय संविधान को एक स्थिर दस्तावेज न बताते हुए इसे जीवंत और विकसित होने वाला माना। उन्होंने कहा कि संविधान के चार मुख्य स्तंभ—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—देश की दिशा निर्धारित करते हैं। डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान पर चर्चा करते हुए उन्होंने संविधान सभा में उनके भाषणों को हर कानून के छात्र के लिए अनिवार्य पढ़ाई बताया। आंबेडकर के तीन प्रमुख शब्दों—समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व—को उन्होंने भारत की सामाजिक-आर्थिक प्रगति का आधार माना। संविधान में संशोधन की व्यवस्था को समयानुसार बदलाव के लिए आवश्यक करार दिया।
व्यक्तिगत यात्रा और सामाजिक परिवर्तन
मुख्य न्यायाधीश ने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक एक सप्ताह पहले इस कार्यक्रम को भावुक अंदाज में याद किया। उन्होंने बताया कि उनका पहला आधिकारिक कार्यक्रम महाराष्ट्र के अमरावती में था, जबकि अंतिम आंध्र प्रदेश के अमरावती में, जो उनकी यात्रा का एक पूर्ण चक्र दर्शाता है। संविधान की ताकत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इसकी बदौलत दो राष्ट्रपति अनुसूचित जाति से और वर्तमान राष्ट्रपति अनुसूचित जनजाति की महिला हैं। अपनी पृष्ठभूमि साझा करते हुए उन्होंने अर्ध-झुग्गी इलाके और नगरपालिका स्कूल से सर्वोच्च न्यायिक पद तक पहुंचने की कहानी को संविधान की सफलता का प्रतीक बताया। साथ ही, महिलाओं के अधिकारों और समानता पर बढ़ती जागरूकता का उल्लेख कर देश में भेदभाव की पुरानी मानसिकता के क्षीण होने की बात कही।
महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में प्रगति
देश में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने वर्षों में आई सकारात्मक बदलावों की सराहना की। उन्होंने कहा कि समानता के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता से पुरानी असमानताओं को चुनौती मिल रही है, जो संविधान के मूल्यों को मजबूत करती है। यह परिवर्तन सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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