पाकिस्तान-सऊदी अरब रक्षा समझौता: एक दूसरे की सुरक्षा की कसम *SAKO* #9
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक ऐतिहासिक रक्षा समझौता हुआ है, जिसने क्षेत्र की सुरक्षा की तस्वीर बदल कर रख दी है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने स्पष्ट किया है कि इस समझौते में दोनों देश एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों सहित अपनी पूरी सैन्य ताकत साझा करेंगे।
क्या है इस डील की मुख्य बातें?
बुधवार, 17 सितंबर को सऊदी अरब की राजधानी रियाद के यमामा पैलेस में हुए इस समझौते के मुताबिक:
· अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।
· दोनों देश मिलकर सैन्य सहयोग बढ़ाएंगे और एक डिफेंस कॉर्पोरेशन विकसित करेंगे।
· पाकिस्तान अपनी परमाणु क्षमता सऊदी अरब के साथ साझा करेगा, हालांकि इसका इस्तेमाल सिर्फ रक्षा के लिए ही किया जाएगा।
'भारत से युद्ध होने पर सऊदी साथ देगा'
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने जियो टीवी को दिए इंटरव्यू में सीधे तौर पर कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है तो सऊदी अरब पाकिस्तान की तरफ से लड़ेगा। उनके शब्द थे, "बिल्कुल, इसमें कोई शक की बात नहीं है।" हालांकि, बाद में उन्होंने कहा कि समझौते में किसी खास देश का नाम नहीं लिया गया है।
समझौते पर किस-किस की थी मुहर?
इस महत्वपूर्ण समझौते पर दस्तखत के वक्त पाकिस्तान की तरफ से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर, उप प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री इशाक डार, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब मौजूद थे। सऊदी अरब की तरफ से क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस पर सहमति दी।
भारत ने क्या कहा?
इस समझौते पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के पहले से मौजूद रिश्तों को एक औपचारिक रूप देता है। उन्होंने कहा कि भारत इस बात की जांच करेगा कि इसका उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ता है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
क्या पाकिस्तान पहले भी कर चुका है ऐसा?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने 1954 में अमेरिका के साथ भी 'म्यूचुअल डिफेंस असिस्टेंस एग्रीमेंट' (MDAA) किया था। इसके तहत अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार और प्रशिक्षण दिया था। हालांकि, भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 और 1971 की जंग में अमेरिका ने सीधे तौर पर पाकिस्तान की मदद नहीं की थी और यह समझौता 1979 में खत्म हो गया था।
एक्सपर्ट्स क्या देख रहे हैं?
अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका के पूर्व राजदूत जलमय खलीलजाद जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या यह सऊदी अरब का अमेरिकी सुरक्षा गारंटी से अलग होने का संकेत है? साथ ही, यह भी कि क्या इसमें कोई गुप्त खंड (secret clause) हैं जो सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
क्या पाकिस्तान बनाना चाहता है NATO जैसा गठबंधन?
इससे पहले, 14 सितंबर को कतर की राजधानी दोहा में हुई एक बैठक में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने सभी मुस्लिम देशों के लिए NATO जैसी एक संयुक्त सैन्य ताकत बनाने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि एक परमाणु शक्ति होने के नाते पाकिस्तान इस्लामिक समुदाय के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।
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